विभाग के बारे में

सन 1962 में विश्वविद्यालय के आधार विभाग के रूप में हिन्दी विभाग की स्थापना की गई. अपने स्थापना वर्ष से ही हिन्दी विभाग में स्नातक,स्नातकोत्तर स्तर पर अध्यापन और शोध कार्य हो रहा है.गुरुकुल काँगड़ी समविश्‍वविद्यालय मूलतः वैदिक शिक्षा पद्धति पर आधारित है. विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी का शिक्षा दर्शन भारतीय संस्कृति पर आधारित था और वे स्वयं मूल्य केन्द्रित शिक्षा के प्रवर्तक थे. उन्होंने भारतीय मनीषा को अकादमिक रूप से स्थापित करने के लिए एक ऐसे संस्थान की परिकल्पना की, जो प्राचीन और अर्वाचीन ज्ञान परम्परा के मध्य एक सेतु स्थापित कर सके. वैदिक दर्शन पर आधारित शिक्षण पद्धति का मूल स्वर निषेधात्मक न होकर समन्वय,संवाद,संयोजन और विमर्शों का स्वर रहा है. इस दृष्टि से गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति ने अपनी प्रगतिशीलता के अकादमिक चरित्र को स्थापित किया तथा भारतीय ज्ञान परम्परा को हमेशा से अपनी प्राथमिकता में रखा. गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति ने प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक में भारतीय संस्कृति के उच्च जीवन मूल्यों,सहोदर भाव तथा राष्ट्र के प्रति बतौर शिक्षार्थी प्रतिबद्धताओं का संरक्षण किया. हिन्दी विभाग ने स्वामी श्रद्धानन्द जी के शिक्षा दर्शन का अनुशीलन किया है. हिन्दी विभाग में विचार के तौर पर भारतीय ज्ञान पम्परा एक विजन डाक्यूमेंट के तौर पर सदैव उपस्थित रही है.

इतिहास

हिन्दी विभाग ने राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में हिन्दी भाषा के उन्नयन के लिए महती भूमिका का निर्वहन किया है. हैदराबाद आन्दोलन में गुरुकुल के स्नातकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. विज्ञान विषयों को हिन्दी भाषा में पढ़ाने का कार्य सर्वप्रथम गुरुकुल काँगड़ी समविश्‍वविद्यालय ने आरम्भ किया था. विज्ञान विषयों के हिन्दी अनुवाद के लिए हिन्दी विभाग ने विज्ञान संकाय के आचार्यों के साथ मिलकर विज्ञान विषयों की हिन्दी भाषा में पुस्तकों को प्रकाशित करने में सहयोग प्रदान किया. हिन्दी भाषा और साहित्य के शिक्षण एवं अनुसंधान हेतु देश के प्रारम्भिक केंद्र के रूप में हिन्दी विभाग ने कार्य किया है.
हिन्दी विभाग द्वारा हिन्दी पत्रकारिता में एक वर्षीय स्नातकोत्तर डिप्लोमा कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, जो हिन्दी भाषी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के आरम्भिक पाठ्यक्रमों में से एक है. इस पाठ्यक्रम से दीक्षित प्रशिक्षु पत्रकार देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर आसीन हैं.

दूरदर्शिता और मिशन

हिन्दी भाषा और साहित्य : विभागीय दृष्टि :-
हिन्दी विभाग भाषा नवीन तकनीकी के माध्यम से नवाचार विकसित करने के लिए विभाग पूर्णत: प्रतिबद्ध है. हिन्दी भाषा की अपनी मूल प्रकृति भी सुरक्षित रहे, साथ ही इसको नूतन प्रविधियों से जोड़कर और अधिक प्रभावी और सम्प्रेषणशील बनाया जाए, इसके लिए हिन्दी विभाग सदैव से तत्पर रहा है. हिन्दी भाषा एवं साहित्य के शिक्षण एवं शोध से मानवीय चेतना परिष्कृत हो, इसके लिए विभाग हिन्दी विषय को अकादमिक अनुशासन के साथ मानवीय सरोकारों से संबद्ध करने के लिए प्रतिबद्ध है.

हिन्दी विभाग : शोध और विभागीय दृष्टि :-
भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के संरक्षण के लिए हिंदी विभाग में शोध विषयों के चयन के समय भारतीय ज्ञान परम्परा यथा काव्यशास्त्र, भाषा विज्ञान, तुलनात्मक साहित्य आदि को प्राथमिकता पर रखा जाता है. वैश्वीकरण के दबाव के कारण हिंदी भाषा का देशज स्वरूप प्राय: उपेक्षित होता प्रतीत होता है.

शोध के माध्यम से क्षेत्रीय बोलियों पर हिंदी विभाग में कई शोध प्रबंध लिखे गए है,जोकि न केवल शोध की दृष्टि से नूतन कार्य हुआ है अपितु उन्हें बोलियों के संरक्षण हेतु एक महत्वपूर्ण कार्य समझा जा सकता है.

बहुधा देखा जाता है कि हिंदी में शोध अधिकांशत: साहित्य केन्द्रित होते हैं, विमर्शों या समाज सापेक्ष प्रभावों का मूल्यांकन करना अपेक्षाकृत सरल होता है. ऐसे में भाषा का वैज्ञानिक पक्ष उतना प्रकाशित नही हो पाता है. हिंदी विभाग ने भाषा के शैली वैज्ञानिक अध्ययन से लेकर भाषा विज्ञान की दृष्टि से बोलियों पर शोध कार्य कराये हैं. ये समस्त शोध हिंदी भाषा की व्यापकता और इसके वैज्ञानिक संदर्शों को समझने में बेहद उपयोगी हैं.

काव्य शास्त्र के तमाम सिद्धांतों यथा अलंकार,बिम्ब,वक्रोक्ति,रस,औचित्य आदि पर नूतन शोध कार्य विभाग में हुए हैं . काव्यशास्त्र को संस्कृत की विषयगत सीमाओं से इतर हिंदी साहित्य के संदर्भ में रेखांकित करने के लिए शोध में काव्यशास्त्र को प्राथमिकता दी गयी है जिसके फलस्वरूप काव्यशास्त्र के आचार्यों की दृष्टि का शोध की दृष्टि से सर्वथा मौलिक मूल्यांकन संभव हो पाया है. भारतीय ज्ञान परम्परा की दृष्टि से यह एक उल्लेखनीय कार्य कहा जा सकता है.

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